महादेव से प्रार्थना, गाज़ा के बच्चों को मिले अमन और बेहतर कल

आशीष शर्मा (ऋषि भारद्वाज)
आशीष शर्मा (ऋषि भारद्वाज)

महाशिवरात्रि का पावन पर्व अभी-अभी पूरे देश में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया गया। मंदिरों में घंटियों की गूंज, “हर हर महादेव” के जयकारे और भक्ति में डूबे श्रद्धालु यह सब हमें एक आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है।

अब समय है रमजान का सब्र, रोज़ा और दुआओं का महीना। एक ऐसा महीना जो इंसान को इंसानियत की याद दिलाता है। यही वह क्षण है जब दिल अपने आप सीमाओं से ऊपर उठ जाता है। धर्म अलग हो सकते हैं, पर दुआओं की भाषा एक ही होती है अमन।

जब पर्व सिर्फ उत्सव नहीं, जिम्मेदारी बन जाए

महाशिवरात्रि हमें संयम और तप की सीख देती है। रमजान हमें सब्र और करुणा सिखाता है। दोनों पर्व हमें भीतर से बेहतर इंसान बनने की राह दिखाते हैं।

आज जब दुनिया के कई हिस्सों में संघर्ष जारी है, गाज़ा के मासूम बच्चे युद्ध, भूख और भय के साए में जी रहे हैं। उनकी आँखों में खिलौनों के सपने नहीं, बल्कि सायरनों की आवाज़ें बस गई हैं।

ऐसे में महादेव से यही प्रार्थना निकलती है हे शिव, उन नन्हे दिलों की आह सुन लीजिए।

War Zones में बचपन सबसे पहले खोता है

युद्ध सिर्फ जमीन नहीं छीनता, वह बचपन छीन लेता है। जब स्कूल की जगह मलबा हो, और कहानियों की जगह धमाकों की आवाज़ हो तब इंसानियत हारती है।

रमजान का महीना दुआओं का महीना है। रोज़ा हमें भूख का एहसास कराता है, ताकि हम दूसरों की भूख समझ सकें। गाज़ा के बच्चे तो रोज़ ही उस परीक्षा से गुजर रहे हैं। हमारी प्रार्थना केवल शब्द न रहे, बल्कि संवेदना बने।

Faith Beyond Borders: धर्म से ऊपर इंसानियत

महादेव करुणा के प्रतीक हैं। इस्लाम रहमत का संदेश देता है। जब दोनों की मूल भावना दया और शांति है, तो हमारी सोच भी वैसी ही होनी चाहिए। यह समय नफरत की भाषा छोड़ने का है। यह समय “हम” और “वे” से आगे बढ़ने का है। अगर हमारी पूजा और इबादत किसी रोते बच्चे के लिए दुआ में नहीं बदलती, तो फिर वह अधूरी है।

Better Tomorrow की उम्मीद

हर बच्चा हकदार है सुरक्षित नींद का, भरपेट भोजन का, स्कूल की किताबों का और मुस्कुराते बचपन का। हम महादेव से यही प्रार्थना करते हैं कि गाज़ा के बच्चों को ऐसा कल मिले जहाँ युद्ध न हो, भूख न हो, और अपनों को खोने का डर न हो।

रमजान की चाँदनी उनके आँगन में सुकून लेकर आए।

Humanity First: यही असली धर्म

आज जरूरत है कि हम त्योहारों को सिर्फ कैलेंडर की तारीख न समझें, बल्कि उन्हें मानवता की पुकार मानें। जब एक हिंदू शिव से प्रार्थना करता है और एक मुसलमान अल्लाह से दुआ करता है और दोनों की मुराद शांति हो तब दुनिया थोड़ी बेहतर बनती है।

हम सबकी सामूहिक दुआ शायद वह बदलाव ला सके जिसकी दुनिया को सख्त जरूरत है।

महाशिवरात्रि की आराधना और रमजान की इबादत दोनों हमें एक ही दिशा दिखाते हैं करुणा।

आज महादेव से यही विनती है कि गाज़ा के बच्चों की दुआ कुबूल हो। उन्हें ऐसा भविष्य मिले जहाँ आसमान में पटाखों की रोशनी हो, बमों की नहीं, जहाँ स्कूल की घंटी बजे, सायरन नहीं, जहाँ माँ-बाप की बाहें सुरक्षित हों, खौफ नहीं।

अंततः, धर्म का सबसे ऊँचा स्वर यही है शांति।

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